प्रकृति एवं स्वास्थ्य को समर्पित है घी सक्रांति का पर्व!

प्रकृति एवं स्वास्थ्य को समर्पित है घी सक्रांति का पर्व!

ऋषिकेश-गढ़वाल के मुख्य द्वार ऋषिकेश के ग्रामीण क्षेत्रों में घी संक्रांति बड़े धूम-धाम के साथ मनाई गई।कृषि, पशुधन और पर्यावरण पर आधारित इस पर्व को लोग हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं।मान्यता के अनुसार इस दिन घी खाना जरूरी होता है। लोककथा के अनुसार कहा जाता है कि जो इस दिन घी नहीं खाता है, उसे अगले जन्म में घोंघा (गनेल) बनना पड़ता है।



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उत्तराखंड की संस्कृति की महान विरासत को जन जन तक पहुंचाने के लिए जमीनी धरातल पर वर्षों से काम कर रही समाजसेवी कुसुम जोशी के मुताबिक उत्तराखंड की संस्कृति और विरासत अपने आप में कई ऐसे पर्वों को भी समेटे हुई है, जिनका यहां की संस्कृति में खास महत्व है।इन्हीं में से एक लोकपर्व घी त्यार भी है।कुमाऊं मंडल में इस पर्व को घी त्यार और गढ़वाल मंडल में घी संक्रांति के नाम से जानते हैं।उन्होंने बताया कि खासतौर पर पहाड़ों में कृषि, पशुधन और पर्यावरण पर आधारित इस पर्व को लोग धूमधाम के साथ मनाते हैं।अंतरराष्ट्रीय गढ़वाल महासभा के अध्यक्ष डा राजे नेगी ने बताया कि घी संक्रांति देवभूमि उत्तराखंड में सभी लोक पर्वों की तरह प्रकृति एवं स्वास्थ्य को समर्पित पर्व है। पूजा पाठ करके इस दिन अच्छी फसलों की कामना की जाती है। अच्छे स्वास्थ के लिए, घी एवं पारम्परिक पकवान हर घर में बनाए जाते हैं.।उत्तराखंड की लोक मान्यता के अनुसार इस दिन घी खाना जरूरी होता है।लोककथा के अनुसार कहा जाता है कि जो इस दिन घी नही खाता है, उसे अगले जन्म में घोंघा (गनेल) बनना पड़ता है।इसलिए लोग इस पर्व के लिए घी की व्यवस्था पहले से ही करके रखते हैं।

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