दो वक्त की रोटी के संघर्ष में जिंदगी लगती है रोज दांव पर!

दो वक्त की रोटी के संघर्ष में जिंदगी लगती है रोज दांव पर!

ऋषिकेश-मोजूदा दौर में इंसानअपनी इच्छाओं के अनुसार हर ऊंचाइयों को छूना चाहता है। इसका सीधा सा अर्थ यह है कि मनुष्य को आज कितनी भी ऊंचाई पर काम करना क्यों न पड़े, उसके लिये कुछ भी असंभव नहीं है।



लेकिन बात सिर्फ दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए जान को जोखिम पर डालने की हो तो जिंदगी का संघर्ष और मर्म समझ आता है।आपने कभी शायद ही सोचा होगा कि बड़ी बड़ी खूबसूरत सी दिखने वाली बिल्डिंगें तैयार कैसे होती हैं।इनमें कारीगरों की मेहनत और मजदूरों का पसीना तो लगा ही होता है साथ ही इनको आकार देने में वो मेहनतकश भी शामिल होते हैं जो सिर्फ घर का चूल्हा जलाने के ही लिए बिना किसी सुरक्षा उपाय के महज एक सीढ़ी पर बंधी रस्सी के सहारे ही ऊंची ऊंची बिल्डिंगों में घंटों हवा में लटक कर काम करते हैं।अकसर उँचाई में काम करने वाले लोगों को गंभीर चोटें लग जाती है, तो कई बार जान का खतरा बना रहता है। इस कार्य को करने के लिये अच्छी सुरक्षा की जरूरत होती है लेकिन यह सुविधाएं इन मजदूरों और पेंटरों को मिल नही पाती खासतौर पर छोटे शहरों में।ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि दो वक्त की रोटी के इंतजाम की जद्दोजहद में कब तक यह लोग अपनी जान को जोखिम में डालते रहेंगे।

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