आर्थिक निर्भरता प्रदान करने तक ही सिमटी आधुनिक शिक्षा!

आर्थिक निर्भरता प्रदान करने तक ही सिमटी आधुनिक शिक्षा!

ऋषिकेश-आधुनिक शिक्षा -पद्धति की अपनी अलग ही विशेषता है, पर दुर्भाग्य है कि यह केवल जीवन में आर्थिक निर्भरता प्रदान करने तक ही सिमट कर रह गई है ।



शहर का प्रबुद्धसमाज इसको लेकर बेहद चिंतित है।
विभिन्न संस्थाओं से जुड़े समाजसेवी डॉ राजे सिंह नेगी का कहना है कि वर्तमान शिक्षा-प्रणाली में समग्रता का पूर्णतया आभाव है । शिक्षा में एक अध्यापक की जिम्मेदारी बहुत ही मायने रखती है ,छात्र अपने कर्तव्य के प्रति कितना सजग एवं सतर्क है ताकि उसका समग्र विकास हो सके । आज की शिक्षा एकांगी हो गई है ।इसका प्रमुख कारण है शिक्षा का व्यवसायीकरण । आज शिक्षा सिर्फ एक व्यवसाय का माध्यम बनकर रह गया है। शिक्षा जीवन के सर्वांगींण विकास की व्याख्या करती है । यह विकास की परिभाषा को स्पष्ट करती है ,इससे जीवन को बेहतर ढंग से जीने की कला मिलती है।मैत्री संस्था की अध्यक्ष कुसुम जोशी के मुताबिक शिक्षा हमारे चहुमुखी विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पुराने समय में शिक्षा ज्ञानदान की पुण्य परम्परा थी , जो की आज महज पैसा एकत्र करने की योजना बन कर रह गई है । पहले योग्य आचार्य जो अपने अन्दर ज्ञान की अनंत भंडार संग्रहित किये रहते थे,वे विद्यार्थियों को समुचित शिक्षा प्रदान कर उनका मार्ग आलोकित करते थे । तब शिक्षा निःस्वार्थ सेवा थी जो ”सर्वजन हिताय” को दर्शाती थी। जीआईसी इंटरनेशनल के डायरेक्टर डॉ गौरव गोयल का मानना है कि आज शिक्षा सिर्फ व्यवसाय का स्रोत है | शिक्षा के कर्णधारों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि आज शिक्षा विश्व बाजार में इतने बड़े व्यवसायिक प्रतिष्ठान के रूप में परिवर्तित हो जाएगी । आज शिक्षा व्यवसाय में बेशुमार पैसा है ।आज उच्च संस्थानों में पढ़ाने के लिए जितना खर्च आता है उससे तो यही लगता है कि एक मध्यमवर्गीय परिवार शायद ही इस बारे में सोचे ।इसका सबसे ज्यादा असर एक योग्य एवं प्रतिभावान छात्रों पर पड़ता है वह चाहकर भी उन संस्थानों में दाखिले से वंचित रह जाता है और यही आज की शिक्षा पद्धति का सबसे बड़ा दुष्परिणाम है।

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