महिला दिवस विशेषः आधी आबादी ने देवभूमि को किया गौरवान्वित!

महिला दिवस विशेषः आधी आबादी ने देवभूमि को किया गौरवान्वित!

समाज के लिए प्रेरणा बनी विलक्षण प्रतिभा की धनी महिलाएं

अनिता ममगाई ने किया नाम रोशन तो कुसुम कंडवाल ने बढ़ाया देवभूमि का मान

ऋषिकेश-समाज के लिए महिलाओं का योगदान अदम्य रहा है। किसी भी समाज में महिलाओं के स्थान से ही उस समाज की पहचान होती है। आज महिलाएं राजनीति, एंटरटेनमेंट, खेल, शिक्षा, लेखन जैसे विभिन्न क्षेत्रों में सबसे आगे हैं। महिलाओं की भूमिका हर जगह अहम साबित हुई है।



तीर्थ नगरी ऋषिकेश की ही बात करें तो शहर में अनेकों महिलाएं ऐसी हैं जोकि अपने जोश और जज्बे के चलते समाज के लिए मिसाल साबित हुई हैं।विडम्बना देखिए यहां की प्रथम नागरिक बनने का सौभाग्य भी एक महिला को मिला है। तकरीबन साढे तीन साल पहले ऋषिकेश की प्रथम महिला मेयर बनी अनिता ममगाई ने जब प्रंचड जीत के साथ निगम की कमान संभाली तो बेहद कम लोगों को ही यह अंदाजा था की वह शहरवासियों की उम्मीदों पर खरा उतर पायेंगी। लेकिन अपने होसले, जज्बे ,दिनरात कार्य करने की छमता और विजन के चलते तमाम उम्मीदों पर वह ना सिर्फ खरी उतरी बल्कि अपनी लगभग हर चुनावी घोषणा को पूरा करने में भी वह कामयाब रही।यह काम आसान नहीं था। ऐसे काम आसान होते भी नही।यही मानना है नगर निगम महापौर का।उनका कहना है की सोच सही हो तो लक्ष्य कोई भी मुश्किल नही होता।शहर को विकास के पथ पर अग्रसर करने के लिए शिद्दत के साथ जुटी मेयर का कहना है कि अभी तो सफर की महज शुरुआत भर हुई है ,बहुत करना तो अभी बाकी है।वहीं राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष कुसुम कंडवाल की बात करें तो उनका शुमार शहर की उन महिलाओं में होता है जिन्होंने पेज थ्री की दुनिया से दूर रहकर और सामाजिक सरोकारों के साथ खुद को इस योग्य बनाया जिससे दूसरों के लिए मिसाल बन सकें। उनका राज्य महिला आयोग की अध्यक्ष चुना जाना देवभूमि के लोगों के लिए एक बड़े सम्मान की बात है।इससे पहले भाजपा की प्रदेश उपाध्यक्ष के तौर पर भी उन्होंने अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहन किया।पैरा अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी सुश्री नीरजा गोयल भी इन दिनों अपने सोशल कार्यों के चलते हुए खूब सुर्खियां बटोर रही हैं।विभिन्न पुरुस्कारों से नवाजी जा चुकी नीरजा ने समाज को सिखाया की कठिन परिस्थितियों में भी चेहरे पर मुस्कान लाकर जीवन किस प्रकार जिया जा सकता है। शारीरिक और मानसिक रूप से अशक्त बच्चों के प्रति संवेदना तो सब रखते हैं, लेकिन नीरजा संवेदना से आगे जाकर मूक-बधिर बच्चों के लिए बड़ी बहन की भूमिका में आ जाती हैं। नीरजा की मानें तो उसे ऐसे बच्चों के लिए काम करना पसंद किया, जो शारीरिक रूप से अक्षम हैं।ट्रस्ट के माध्यम से वह अशक्त बच्चों के साथ खड़ी हैं।उसने बताया की उसकी जिंदगी का एक ही मकसद है,जो मेरे पास आए, कुछ बनकर जाए, कुछ सीखकर जाए।ऋषिकेश के आई डी पी एल कॉलोनी में बचपन गुजारने वाली नगमा इरफान ने शिक्षा के जो बीज बोए हैं, उनसे दूसरों के हिस्से में रोशनी आई है और उसकी मुट्ठी में ढेर सारी खुशबू।उसके अब्बा ने आई डी पी एल में पूरी जिंदगी पसीना बहाया वही उसकी अम्मी ऋषिकेश के
विभिन्न स्कूलों में प्राइमरी शिक्षिका रही।पड़ाई का महौल घर में था ही तो नगमा भी कहां पीछे रहने वाली थी।बचपन से ही कुछ बनने की ललक उसके भीतर थी।समय का पहिंया तेजी से घूमा तो उसने इस मिथक को तोड़ने की ठान ली की मुस्लिम महिलाएं भी उच्च शिक्षित होकर समाज और देश सेवा कर सकती हैं।सब्जेक्ट भी उसने वो चुना जिससे छात्राएं कोसों दूर भागती हैं। मैथमेटिक्स में टाँपर रहने के साथ उच्च शिक्षा हासिल करने वाली डा नगमा इरफान कई बरस बीत जाने के बाद भी खुद से किए हुए अपना वादे को भूली नही है।अपने शौहर के आफिस को बखूबी संभालने के साथ साथ वह बच्चों को भी शिक्षित कर रही हैं। बच्चों को स्कूल न भेजने वाले अभिभावकों को शिक्षा का महत्व भी समझा रही हैं। अपनी कोशिश से अब तक अनेकों
बच्चों को स्कूल में दाखिल करवा चुकी हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को नगमा अपने परिवार की मदद से पाठ्य सामग्री भी उपलब्ध कराती हैं।मैत्री संस्था की अध्यक्ष कुसुम जोशी की बात करें उत्तराखंड की संस्कृति के प्रचार प्रसार संरक्षण एवं संर्वधन के साथ नशा मुक्त उत्तराखंड के दोहरे मिशन पर वो वर्षों से डटी हुई हैं।यही नही दूसरों की मदद करना यह अच्छी आदत भी अब उनके एक अभियान का हिस्सा है। ससुराल से पीड़ित कोई लड़की, घर से निकाला गया कोई बुजुर्ग या कोई असहाय मां की मदद करना ये सब मैत्री संस्था की अध्यक्ष कुसुम जोशी का मकसद है।किसी महिला को मुसीबत में देखकर वह ढाल की तरह सामने खड़ी हो जाती हैं और पीड़ित महिलाओं के लिए तब तक मदद की मुहिम चलाती रहती हैं, जब तक उनकी समस्या का समाधान न हो जाए। दर्द से भरी और हताशा से घिरी जिंदगी में मुस्कान घोलना आसान काम नहीं, लेकिन वह इस कठिन कार्य को बेहद आसानी से कर रही हैं।राज्य आंदोलनकारी बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ अभियान की संयोजिका सरोज डिमरी कहती हैं,मेरा मकसद बच्चों को शिक्षित और स्वरोजगार की दिशा में सक्षम बनाना है। शादी में सात फेरे लेने वाले नव युगलों को ‘आठवां वचन’ भी वह दिलाती हैं कि वे कन्या-भ्रूण हत्या नहीं करेंगे, बेटी को जन्म लेने देंगे।सड़क पर पड़ी बीमार महिला को अस्पताल पहुंचाना, भूखी महिला को भोजन उपलब्ध कराना, उनकी पेंशन बनवाना, राशन कार्ड बनवाना, वस्त्र, भोजन उपलब्ध कराना सरोज डिमरी की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। उन्होंने बताया की इसी में उन्हें सच्ची खुशी मिलती है।देवभूमि ऋषिकेश की पावन भूमि पर भक्ति के सुर तो बहुत गूंजते हैं, लेकिन यहां हरिचंद गुप्ता आर्दश बालिका इंटर कॉलेज की प्रधानाध्यापिका पूनम शर्मा सेवा के सुर भी लगा रही हैं। लाचार बुजुर्ग महिलाओं के दर्द को अपना बना लेने वाली पूनम स्कूल से समय मिलने पर चुपचाप दर-दर भटकने वाली लाचार और असहाय महिलाओं की मदद करने निकल पड़ती हैं।इसके अलावा निर्धन बच्चियों की शिक्षा पर वह पूरा फोकस किए हुए हैं।उनका मानना है कि समाज के चेहरे पर हंसी और खुशी पैसों से नहीं आती। समाज चहकता है शिक्षा के सुर से।

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