होली पर्व पर बन रहा दुर्लभ संजोग सुख सृमद्धि में करेगा वृद्धि-राजेंद्र नौटियाल

होली पर्व पर बन रहा दुर्लभ संजोग सुख सृमद्धि में करेगा वृद्धि-राजेंद्र नौटियाल

ऋषिकेश-वसंत ऋतु के आगमन के साथ फागुनी बयार शुरू हो जाती है। हर ओर होली की रंगत का अहसास होने लगता है। इन दिनों ऐसा ही कुछ माहौल है। होली को लेकर तैयारियां भी शुरू हो गयी हैं। इस बार होलिका दहन पूर्वा फाल्‍गुनी नक्षत्र के दुर्लभ संयोग में होगा।
है, जिससे सुख-समृद्धि आएगी। समाज में आपसी प्रेम और सौहार्द बढ़ेगा।



यह कहना है उत्तराखंड के विख्यात ज्योतिषाचार्य पंडित राजेन्द्र नहीं नौटियाल का।उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति में प्रत्येक तीज-त्योहार का पौराणिक महत्व होता है। हाेली पर भी ऐसा है। पौराणिक कथा के अनुसार हिरण्यकश्प की बहन होलिका अपने भतीजे प्रहलाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठी थी। होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी और प्रहलाद जलकर भस्म हो जाएगा। मगर, प्रहलाद की असीम भक्ति से होलिका जलकर भस्म हो गई, जबकि भक्त प्रहलाद सकुशल निकलकर बाहर आ गए। इसलिए पूरे देश में धूमधाम से होली उत्सव मनाया जाता है। इस बार 17 मार्च को फागुन शुक्ल पक्ष की प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जायेगा। दोपहर 1.29 बजे तक चतुर्दशी तिथि रहेगी। रात में 1.09 बजे तक भद्रा रहेंगी। इसके बाद पूर्णिमा तिथि लग जाएगी। पूर्णिमा तिथि 18 मार्च को दोपहर 12.47 बजे तक रहेगी। 10 मार्च से होलाष्टक प्रारंभ हो जाएंगे। बताया कि, 17 मार्च को चतुर्दशी तिथि दिन में ही समाप्त हो जाएगी। भद्रा में होलिका का दहन करना वर्जित माना गया है, मगर शास्त्रों में वर्णित है कि भद्रा निशीथ काल के बाद तक रहे तो ऐसी स्थिति में भद्रा का मुंह छोड़कर निशीथ काल के पहले ही होलिका का दहन किया जाना उचित है। इस वर्ष भद्रा निशीथ काल के बाद तक रहेगी। भद्रा का मुंह काल दिन में ही रहेगा। इससे प्रदोष काल में ही होलिका का दहन किया जाना शास्त्र के अनुसार ठीक है। 17 मार्च को होलिका पूजन दोपहर 1.28 बजे से पहले करना उचित रहेगा। शाम को प्रदोष वेला में 6.43 बजे से रात 9.08 बजे तक होलिका दहन करना श्रेष्ठ रहेगा। 18 मार्च को होली धूमधाम से मनाई जाएगी।

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