नरेंद्र नगर विधानसभा सीट पर अपनों की गलतियों से घिरा योद्वा!

नरेंद्र नगर विधानसभा सीट पर अपनों की गलतियों से घिरा योद्वा!

चाटूकारों ने बढ़ाई नेता जी की मुश्किलें

विकास की गंगा बहाने के बाद भी संकट में सुबोध

ऋषिकेश-अमित सूरी-उनकी कार्यशैली के विरोधी भी मुरीद हैं।अधिकारियों से काम किस तरह करवाया जाता है उत्तराखंड के अनेकों जनप्रतिनिधियों ने उनसे ही सीखा है।



जी हां हम बात कर रहे हैं नेता जी के नाम से विख्यात नरेन्द्र नगर विधानसभा सीट से भाजपा के सिंबल पर चुनाव लड़े सुबोध उनियाल की।उत्तराखंड सरकार में शासकीय प्रवक्ता के तौर पर अनेकों मर्तबा सरकार को मुश्किल से निकालने वाले सुबोध उनियाल इस चुनाव में खुद मुश्किल में नजर आ रहे हैं।कारण ,उत्तराखंड की डबल इंजन सरकार की नाकामी ,जातीय समीकरण अथवा एंटीइनकबेंसी नही बल्कि उनके ही टीम के सिपाहसालारों को बताया जा रहा है।टिहरी जनपद की नरेन्द्र नगर विधानसभा सीट का जिक्र करें तो सुबोध उनियाल का एकमात्र नाम ऐसा है जो क्षेत्र के लोगों के जहन में तुरंत आ जाता है।यह सिलसिला वर्षों से बदस्तूर चला आ रहा है।उस वक्त भी जब सुबोध उनियाल कांग्रेस के कद्दावर नेता थे और मोजूदादौर में भी जब उनका शुमार भाजपा के मजबूत छत्रपों में किया जाता है।भाजपा सरकार में कृषि मंत्री के तौर पर बेहतरीन परफोर्मेंस देने वाले सुबोध उनियाल जब मिशन2022 के लिए मैदान में उतरे तो इस मर्तबा भी उनके सामने वही योद्वा था जिससे उनका पहले भी लगातार सामना होता रहा है।यह दीगर बात है कि चुनाव से ऐंड समय पूर्व तक भाजपा में जुड़े रहे ओम गोपाल रावत ने टिकट कटते ही पाला बदलते हुए कांग्रेस में जाने में दैर नही लगाई।कद्दावर नेता माने जाने वाले ओम गोपाल रावत को कांग्रेस ने भी टिकट देने में कोई खास दैर नही लगाई।इस बीच चुनावी संग्राम में दोनों धुरंधरों ने एक दूसरे के खिलाफ जमकर सियासी तीर चलाये।
कौनसा योद्वा जनता की नब्ज टटोलकर उनके दिलों पर दस्तक देने में कामयाब रहा इसका पता तो दस मार्च को आने वाले जनादेश में ही चलेगा लेकिन क्षेत्र के राजनैतिक पंडितों की मानें तो इस सियासी संग्राम को रोमांचक दंगल बनाने में भाजपा प्रत्याशी सुबोध उनियाल के सिपासलारो की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही है।चुनावी कैम्पेन के दौरान भी जनता की नाराजगी नेता जी से कम उनकी चाटूकार मंडली से अधिक दिखी।बताया तो यहां तक जा रहा है।जिन लोगो पर भाजपा प्रत्याशी ने आंख मूंदकर भरोसा कर उन्हें जनता और उनके बीच सेतु बनकर काम करने की जिम्मेदारी सौंपी थी अपनी जिम्मेदारियों का दायित्व निभाने में पूरी तरह से नाकाम दिखे।इन सबके बीच बड़ा सवाल यही है कि जनादेश के बाद नेता जी एक बार फिर से सबसे बड़ा खिलाड़ी बनकर उभर पायेंगे या नही।

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