जीवन बचाना है तो प्रकृति के साथ जीवन जीना सीखिये-जुगलान

जीवन बचाना है तो प्रकृति के साथ जीवन जीना सीखिये-जुगलान

ऋषिकेश- भारतवासियों को अप्राकृतिक जीवन शैली तबाही की और ले जा रही है। हम नकल करने में बहुत होशियार हैं। एक समय था जब विश्व भारत का अनुसरण करता था। आज भारतीय रहन-सहन, केश, वेश, नृत्य, गीत, संगीत, फैशन, दावत, जीवन की हर क्रिया में नकलची हो गए हैं। यह कहना है तीर्थ नगरी ऋषिकेश के विख्यात पर्यावरणविद समाजसेवी विनोद जुगलान विप्र का।

पर्यावरण सुरक्षा को लेकर वर्षों से जन जागरण अभियान चला


रहे जुगलान की मानें तो जो समाज दूसरों को देखकर चलता है वह अपनी चाल भूल जाता है। प्रकृति के साथ जिओ, प्रकृति के साथ रहो, प्रकृति का दिया ही भोजन करो। प्रकृति के साथ रहोगे, तभी बच पाओगे। कोरोना काल में गलत जीवन और भोजन शैली के कारण तबाही झेलनी पढी।उन्होंने बताया कि मौसम के साथ वनस्पतियों के गुण, धर्म बदल जाते हैं। भारत की सभी वनस्पतियां औषधियां हैं। शरीर की रक्षा करिए, शेखी थोड़ी देर की होती है। रोग की पीड़ा स्वयं को भोगनी होती है। इसलिए प्रकृति के साथ जीना सीखिए, तभी बच पाएंगे।

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