मातृभाषा हिंदी के प्रति मां जैसी हो श्रद्वा-डॉ सुनील दत्त थपलियाल

मातृभाषा हिंदी के प्रति मां जैसी हो श्रद्वा-डॉ सुनील दत्त थपलियाल

ऋषिकेश-हिन्दी हमारी मातृभाषा है, इसलिए हमारा अपनी भाषा के प्रति एक विशेष अनुराग होना चाहिए। हमें अपनी मां के प्रति जितनी श्रद्धा होती है, उतनी ही अपनी भाषा के प्रति भी होनी चाहिए। हम अपनी हिन्दी-भाषा का समादर तभी कर पाएंगे, जब उसको शुद्धता के अलंकरण से सुसज्जित कर सकेंगे।



यह कहना है शिक्षाविद व शहर के सुविख्यात साहित्यकार डॉ सुनील दत्त थपलियाल का। उत्तराखंड के सर्वश्रेष्ठ मंच संचालकों में से एक डॉ थपलियाल के अनुसार अध्ययन और अभ्यास द्वारा विद्यार्थी शुद्ध लेखन-वाचन करना सीख सकते हैं।उन्होंने बताया मोजूदादौर में देश और दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियां हिंदी को अपने असीमित बाजार के रूप में देख रही हैं, तब हम क्यों खुद ही अपनी हिंदी की शक्ति को नहीं समझ पा रहे हैं।उन्होंने कहा कि किसी भी विषय पर मंथन करने से पूर्व उस विषय के गर्भ तक जाना सदैव प्रशंसनीय रहता है। हिंदी भाषा के अंतरराष्ट्रीय संवर्धन पर जाने से पूर्व हमारा यह देखना बेहद जरूरी है कि हिंदी का भारत देश में ही राष्ट्रीय संवर्धन किस स्तर तक हो रखा है ।

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