वन्य औषधीय पौधों के संरक्षण में आदिवासियों का महत्वपूर्ण योगदान-चिदानंद मुनि

वन्य औषधीय पौधों के संरक्षण में आदिवासियों का महत्वपूर्ण योगदान-चिदानंद मुनि

ऋषिकेश- परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने आज विश्व आदिवासी दिवस पर अपने संदेश में कहा कि प्रकृति, संस्कृति और वन्य जलस्रोतों को बचाये रखने के लिये आदिवासियों का महत्वपूर्ण स्थान है। उनकी अनूठी संस्कृति, जीवन शैली और उनकी विभिन्न प्रकार की बोलियों को बचाये रखना जरूरी है।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने कहा कि वन, वृक्ष और वन्यप्राणियों के संरक्षण में आदिवासियों का महत्वपूर्ण योगदान हैं । इस आबादी के अधिकारों को बढ़ावा देना एवं उनकी रक्षा करना हम सभी का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि आदिवासियों की भाषाओं के संरक्षण एवं प्रलेखन के साथ उनकी संस्कृति, परम्पराओं और खेती करने की अद्भुत संस्कृति को जीवंत बनाये रखना बहुत आवश्यक है।



इस अवसर पर स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने प्रयागराज कुम्भ 2019 में आयोजित कीवा फेस्टिवल जिसमें विश्व के कई देशों के आदिवासी एवं जनजातियों के सदस्य एक साथ परमार्थ निकेतन शिविर में एकत्र हुये थे। उन्होंने अपनी अनूठी संस्कृति, पूजन पद्धति, जीवन शैली और परम्पराओं से सभी को अवगत कराया था। आदिवासी संस्कृति को बचाये रखने के लिये आदिवासी महोत्सव, अनुसंधान और आदिवासी संस्कृति को बढ़ावा देने हेतु कीवा महोत्सव जैसी विभिन्न गतिविधियाँ संचालित किया जाना जरूरी है। कहा कि, आदिवासियों को शिक्षा, और नई जानकारियों, नये उपकरणों और सूचनाओं की जानकारी देना, उन्हें सशक्त करना और जागरूक करना जरूरी है। साथ भाषाओं और खेती एवं फसल उत्पादन के तरीकों को और सृमद्ध करना तथा गुणवत्ता एवं एकरूपता युक्त शिक्षा, चिकित्सा एवं अन्य मौलिक सुविधायें सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। आदिवासियों का निवास वनों में ही रहता है इसलिये वे वनों में पायी जाने वाले औषधीय पौधों एवं समृद्ध कृषि प्रणाली के अच्छे जानकार होते है उनकी इस जानकारी के विस्तार के लिये भी योजना बनायी जानी चाहिये। जनजातीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और बढ़ावा देने तथा अन्य लोगों को जागरूक करना जरूरी है। साथ ही एक ऐसा प्लेटफार्म हो जहां पर आदिवासी एवं अन्य जनजातियों को अपने उत्पाद एवं वन्य उत्पादों को बेचने हेतु एक सुविधाजनक स्थान प्राप्त हो सके इस पर भी कार्य करने की आवश्यकता हैं।

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