लोकपर्व उत्तराखंड की संस्कृति का प्रतीक- चिदानन्द सरस्वती

लोकपर्व उत्तराखंड की संस्कृति का प्रतीक- चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश- परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने प्रदेशवासियों को लोकपर्व रूटल्या त्यौहार की शुभकामनायें देते हुये कहा कि उत्तराखंड की संस्कृति बड़ी ही अद्भुत है। पूर्वजों ने पहाड़, प्रकृति, संस्कृति और संतति की रक्षा के लिये हरेला और रूटल्या जैसे लोकपर्व की परम्पराओं का शुभारम्भ किया ताकि उत्तराखंड के अनाजों, दलहन और तिलहन के महत्व को आने वाली पीढ़ियां भी समझें जिससे पलायन को भी रोका जा सके। लोकपर्व रूटल्या, हरेला, फूलदेई और घी संक्रान्ति जैसे प्रकृति और संस्कृति से जुड़े पर्व हमें दशकों से चली आ रही संस्कृति से; अपने मूल और मूल्यों से जोड़ते हैं।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज ने कहा कि रूटल्या पर्व हमें गेंहू, जौ, मंडुवा, झंगोरा, कौणी, कीनोवा, गहथ, उड़द, लोभिया, सूंट, रयान्स आदि फसलों के महत्व और उनकी पौष्टिकता से परिचित कराते हैं। रूटल्या पर्व के अवसर पर परिवार के सभी सदस्य एक साथ मिलकर उड़द, गहथ, रयान्स, लोबिया आदि दलहन की पुडिंग से भरी रोटी बनाकर खाते और खिलाते हैं ताकि आपसी प्रेम और भाईचारा बना रहे तथा इस पौष्टिकता युक्त अनाज के बारे में सभी को जानकारी मिल सके।



उन्होंनेसमर्पित संस्था के युवाओं को विचारों की ऊर्जा देते हुये कहा कि युवा शक्ति जोश और उमंग के साथ सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ते रहें। युवाओं के पास जोश तो हो पर होश भी हो। युवा शक्ति जोश में रहें पर होश में भी रहें। युवाओं को संदेश देते हुये कहा कि जीते जी रक्त दान और जाते-जाते नेत्र दान, यह बहुत जरूरी है जिससे हम अनेकों को जीवन और रोशनी प्रदान कर सकते हैं। समर्पित संस्था के युवाओं को जल संरक्षण का संदेश देते हुये स्वामी चिदानंद ने विश्व ग्लोब का जलाभिषेक कर जल एवं पर्यावरण संरक्षण का संकल्प भी कराया। इस अवसर पर योगाचार्य विमल वधावन ने भी युवाओं को प्रेरणादायी संदेश दिया।

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