विश्व निद्रा दिवस के अवसर एम्स में आयोजित होंगे जनजागरूकता कार्यक्रम

विश्व निद्रा दिवस के अवसर एम्स में आयोजित होंगे जनजागरूकता कार्यक्रम ऋषिकेश-अ​खिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान एम्स ऋषिकेश के निद्रा रोग प्रभाग के अनुसार लोगों में भिन्न भिन्न कारणों से निद्रा रोग की समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। विशेषज्ञ चिकित्सकों के अनुसार इन रोगों से ग्रसित मरीज यदि समय पर उपचार शुरू नहीं कराते हैं तो उसके स्वास्थ्य पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है और समय के साथ साथ व्यक्ति अन्य दूसरी घातक बीमारियों की गिरफ्त में आ जाता है,जिससे मरीज के जीवन को खतरा पैदा हो सकता है।





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संस्थान में एम्स निदेशक पद्मश्री प्रोफेसर रवि कांत की देखरेख में 19 मार्च शुक्रवार को विश्व निद्रा दिवस के अवसर पर विभिन्न जनजागरुकता कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा,जिसमें मरीजों व उनके तीमारदारों को निद्रा रोगों के दुष्प्रभावों के प्रति जागरुक किया जाएगा।चिकित्सकों के अनुसार अच्छी गुणवत्ता व आराम की नींद दिनभर की व्यस्तता व भागदौड़ भरे जीवन के लिए आवश्यक है। उन्होंने एक अध्ययन से सुझाव दिया है कि,नींद की मात्रा समयावधि की बजाय नींद की गुणवत्ता का हमारे जीवन की कार्यकुशलता और स्वास्थ्य को अधिक प्रभावित करता है। उनका मानना है कि नींद के विकार महत्वपूर्ण सामाजिक और व्यक्तिगत बोझ का कारण बनते हैं और एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभरते है.हाल के दिनों में अध्ययन के माध्यम से यह देखा गया है कि पहाड़ ( समुद्र तल से 2000 मीटर की ऊंचाई ) पर रहने वाले लोगों की नींद की गुणवत्ता सामान्य ऊंचाई पर रहने वाले लोगों के अपेक्षा काफी खराब है।पहाड़ों पर रहने वाले लोगों की नींद की गुणवत्ता खराब होने के कई कारण हैं। जैसे रक्त में ऑक्सीजन की कमी के कारण श्वांस में अनियमितता, सांस की गति बढ़ जाना एवं सांस की गति का कम हो जाना, सोने के दौरान पैरों में बेचैनी, बार -बार नींद से दिमाग का जग जाना, नींद संबंधी विचार का बार – बार आना आदि। बताया गया है कि विश्वभर में लगभग 14 करोड़ लोग पहाड़ों ( मध्यम से अधिक ऊंचाई ) पर निवास करते हैं और करीबन 4 करोड़ लोग पहाड़ों की यात्रा करते हैं। भारत में भी लगभग 5 से 6 करोड़ लोग पहाड़ों (मध्यम से अधिक ऊंचाई ) वाले स्थानों मसूरी, नई टिहरी, पौड़ी, लैंसडाउन, उत्तरकाशी, नैनीताल आदि स्थानों पर रहते हैं। उत्तराखंड में किए गए शोध में पाया गया है कि समुद्रतल से 2000 मीटर की ऊंचाई पर स्थायीतौर पर निवासरत रहने वाले हर पांच में से उक व्यक्ति को निद्रा संबंधी परेशानी होती है।
शोध में मुख्यतः नींद की गुणवत्ता में कमी की समस्या देखी गई है।

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