पर्वो पर आतिशबाजी नहीं आनन्द हो-स्वामी चिदानन्द

पर्वो पर आतिशबाजी नहीं आनन्द हो-स्वामी चिदानन्द

ऋषिकेश- परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि भारत की संस्कृति सद्भाव, समरसता और सहयोग की संस्कृति है। हमारे देश में मनाये जाने वाले पर्व हमारी संस्कृति का दर्पण है। पर्व और त्योहार मेलजोल की संस्कृति को बढ़ाते है जिससे आपसी समन्वय और सहभागिता का वातावरण तैयार होता है।

स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि आध्यात्मिक दृष्टि से कार्तिक माह का बड़ा महत्व है, यह माह जीवन में उल्लास और उमंग लेकर आता है। वर्तमान समय में हमारे पर्वों का स्वरूप कुछ बदल गया है, वास्तव में हमारे पर्व हमें प्रकृति के संरक्षण में जीना सिखाते है। जीवन, जितना नैसर्गिक हो उतना ही बेहतर होता है। स्वच्छ वायु, शुद्ध जल और ताजे फल मिल जाये तो नैसर्गिक आनन्द की प्राप्ति होती है परन्तु वर्तमान समय में यह सम्भव नहीं है। हमारे चारों ओर प्रदूषण बढ़ रहा है। आने वाला दीपावली पर्व हमें अपार खुशियां देता है, साथ ही इस पर्व पर चारों ओर जो आतिशबाजी की जाती है उससे वायु प्रदूषण और भी बढ़ जाता है। वैसे तो वायु प्रदूषण पर्यावरणीय स्वास्थ्य जोखिमों में से एक है। वायु प्रदूषण धरती पर रहने वाले सभी जीव एवं वनस्पति के साथ बच्चों के स्वास्थ्य और उनके विकास को काफी प्रभावित करता है। यह न केवल फेफड़ों को नुकसान पहुंचाते है बल्कि मस्तिष्क को भी नुकसान पहंचाते है। इससे कृषि तथा जलवायु पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है।
स्वामी चिदानंद ने कहा कि वायु की गुणवत्ता में सुधार लाकर न केवल हम अपने समाज की रक्षा करते है बल्कि पूरे प्लानेट को सुरक्षित कर सकते है इससे निजात पाने का अब केवल एक ही उपाय बचा है और वह है प्रकृति के अनुसार जीना, नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब हमें बोतलबंद पानी की तर्ज पर बोतलबंद हवा तथा छोटे-छोटे बच्चों को स्कूल बैंग के साथ ऑक्सीजन सिलेन्डर भी लटकाना पड़ सकता है।

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