परिस्थितियों के विजेता हैं साहित्यकार नरेंद्र रयाल

परिस्थितियों के विजेता हैं साहित्यकार नरेंद्र रयाल

ऋषिकेश- हमने तो संघर्षों से ही लक्ष्य शिखर को पाया है,विद्वंशों के तांडव में भी गीत सृजन का गाया है।
उक्त पंक्तियाँ एक ऐसी प्रतिभा के लिए चरितार्थ होती हैं जिन्होंने जीवन की उन विषम परिस्थितियों के झंझावतों को चीर कर निरन्तर आगे बढ़ने का संकल्प लिया ओर आज अपने को एक बेहतरीन शिखर पर स्थापित किया। वह प्रेरक प्रतिभा आवाज़ साहित्यिक संस्था के साथ अनेकानेक संस्थाओं से जुड़ी हुई है जो किसी परिचय के मोहताज नहीं बल्कि उनकी हिम्मत धैर्य और संकल्प शक्ति परिचय का प्रतीक है। ऐसे साहित्यकार कवि गायक लेखक नरेंद्र रयाल अपने मे साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर के रूप मे हैं।

सामान्य परिवार मे जन्मे नरेंद्र बाल्यकाल से ही बिलक्षण प्रतिभा के धनी रहे ।उच्च शिक्षा की ओर जैसे ही नरेंद्र ने कदम रखे।लेकिन जीवन के साथ एक ऐसी अनहोनी हो गई जिसके कारण इनकी दृष्टि चली गई । अनेक प्रयास करने के बाद जब दृष्टि नहीं लौटी तो नरेंद्र रयाल ने संकल्प के शिखर पर साधना करना शुरू किया। जिसका प्रतिफल उन्हें आज सामान्य समाज मे प्रतिभा की कसौटी पर निखरने से मिल रहा है। इस घटना के बाद भी नरेंद्र रयाल ने आगे बढ़ना शुरू किया उच्च शिक्षा मे बीए , के बाद एम ए (समाज शास्त्र) से ,और उसके बाद बीएड (शिक्षा विशारद ) दृष्टि दोष के लिए स्पेशल कोर्स देहरादून राष्ट्रीय दृष्टि बाधित केंद्र से करने के बाद अपने मेहनत लग्न से आगे बढ़ते रहे ओर साहित्य के क्षेत्र मे महत्वपूर्ण प्रतिभा के रूप मे अपनी पहचान राष्ट्रीय साहित्यिक मंचों पर अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों मे प्रतिभाग लेकर खास बनाई ।
स्वभाव से सरल सौम्य नरेंद्र रयाल गढ़वाली साहित्य मे व्यंग्यात्मक शैली मे रचनाओं के लिए जाने जाते हैं ।इसके अतिरिक्त वीर रस , करुणा,प्रेम, सम सामयिक विषयों पर बेहतरीन लिखते हुए अनेकों पत्र पत्रिकाओं, काव्य ग्रन्थों के साथ आवाज़ साहित्यिक संस्था के हर संकलन मे आपकी रचनाएँ संकलित हैं ।
सम्पूर्ण उत्तराखण्ड के जनपदों के मंचों के साथ सम्पूर्ण प्रान्तों मे जहाँ उत्तराखण्डी प्रवासी रहते है मंच मे महफ़िल सजाने का काम करते है ।
आकाशवाणी दूरदर्शन के साथ समय -समय पर अनेक निजी चेनलों पर भी रचनाएँ देते हैं ,सुनाते हैं ।
विलक्षण प्रतिभा के धनी नरेंद्र रयाल ने अनेक पुस्तकों का संकलन भी तैयार किया है जिसमें-प्रेमांश,आभा की तलाश, हमारे जांबाज सरहद पर , गढ़वाली भाषा मे -मेरु बचपन मेरु गों मुख्य रुप से हैं ।
नरेंद्र रयाल की दृष्टि विलीन होने पर काफी मार्मिक लाइने गुनगुनाते देखे गये हैं जिसमें उनका विश्वाश सदैव विजय का रहा है,– जिंदगी हर पल तेरा ही जिक्र है ,तू किस क़दर बीत जाएगी बस यही फिक्र है।
आशाओं के दहकते दीप अब मुरझाने लगे हैं।
उम्मीद आज भी नहीं टूटी बस यही शुक्र है।
उक्त पंक्तियाँ सदैव नरेंद्र रयाल को आगे बढ़ने का सम्बल देती हैं ।ऐसी महान प्रतिभा जो लोकप्रियता की अद्भुत मिशाल हैं ।परिवार मे पत्नी श्रीमती संगीता जो जतो नाम ततो गुण की भावना लेकर हर पल साये की तरह साथ देती है ,इनके विश्वास का दीप है जिसकी रोशनी से हर कदम आगे बढ़ते हुए अपनी मंजिल तक पहुँचे हैं । त्रिलोकी नाथ से यही जिक्र हमेशा नरेंद्र रयाल करते हैं कि तु तीनों लोकों को देखने वाला है भले मै इस लोक को अब केवल तेरी ही कृपा से देख रहा हूँ इस उम्मीद के साथ नरेंद्र रयाल सभी के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!
%d bloggers like this: