स्वच्छ जल और शान्ति का स्रोत मांं गंगा-स्वामी चिदानंद सरस्वती

स्वच्छ जल और शान्ति का स्रोत मांं गंगा-स्वामी चिदानंद सरस्वती

ऋषिकेश- गंगा दशहरा के पावन अवसर पर माँ गंगा को अविरल और निर्मल बनाये रखना हेतु वेबिनार का आयोजन किया गया जिसमें परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती महाराज, डॉ रमेश पोखरियाल निशंक केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री सहित कई विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों एवं प्रोफेसरों ने सहभाग किया।

सोमवार को वर्तमान में आयी वैश्विक कोविड-19 महामारी के कारण हुये लॉकडाउन के दौरान, नदियों में और उसके आस-पास वन्यजीवों की दृश्यता में वृद्धि के साथ ही नदियों का स्वच्छ स्वरूप और स्वच्छता के साक्ष्य प्राप्त हुये है। जैसा कि हम पोस्ट-लॉकडाउन, उद्योग को फिर से शुरू करते हैं, तो यह जरूरी है कि हम इस झलक को याद रखें कि लाॅकडाउन के दौरान नदियों ने अपना प्राचीन स्वरूप, पवित्रता, सुंदरता का दर्शन कराया और प्रदूषण के प्रभाव को तेजी से कम किया है इस पर विशेष ध्यान दिये जाने की जरूरत है। अब इसे कैसे निर्मल बनाये रखा जा सकता है, इस पर विशेषज्ञों ने अपने विचार व्यक्त किये।
हमें नदियों के प्रवाह एवं उपचार के लिए प्रणालीगत बदलाव लाने के लिए कार्य करना होगा, ऐसा बदलाव जो उन्हें समृद्ध बनाता है, उनकी समृद्ध, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं को संरक्षित करता है। इस पैनल में चर्चा का उद्देश्य उन तरीकों की जांच करना था जिससे हम अपने पर्यावरण के साथ और अधिक सामंजस्य में रह सकते हैं, नदियों, पारिस्थितिक तंत्र के स्वास्थ्य का समर्थन करते हैं, और जैव विविधता को बनाये रखने हेतु मिलकर प्रयास करेंगे। इन कारवाइयों में सरकारी नियम और प्रवर्तन के साथ ही समाज के सभी स्तरों पर यथा बच्चों से लेकर बड़ों तक तथा नागरिकों से लेकर निगमों तक की जिम्मेदारी व दायित्वों पर विचार विमर्शं किया गया।
तालाबंदी के दौरान अभी गंगा में क्या विशिष्ट परिवर्तन हुए हैं? पानी की गुणवत्ता, पोस्ट-लॉकडाउन भी इसे बनाए रखने हेतु क्या किया जाये। इसके संबद्ध में संस्थानों द्वारा भविष्य में क्या किया जायेगा, इस पर व्याख्या की गयी।केन्द्रीय मंत्री.डा रमेश पोखरियाल निशंक ने कहा कि गंगा माँ सभी के लिये समान भाव रखती है। भारत की तो संस्कृति ही ऐसी है कि वह पूरे विश्व को एक परिवार मानती है, हम वसुधैव कुटुम्बकम् की संस्कृति को जीते है। हमने धरती को माता कहा है। भारत हमेशा से सभी का सहायक रहा है। माँ गंगा राष्ट्रीय धरोहर ही नहीं बल्कि विश्व धरोहर है। माँ गंगा के स्पर्श से ही शान्ति मिलती है। कहा जाता है कि माँ गंगा के जल में व्याधियों के निवारण की क्षमता है। माँ गंगा के लिये पूरे विश्व को संवेदनशील होना होगा। उन्होंने कहा कि हम सभी के प्रयासों से हम उत्तराखंड़ से माँ गंगा को गंगोत्री की तरह ही पवित्र और निर्मल रूप में आगे प्रवाहित करने में अपना योगदान अवश्य देंगे। उत्तराखंड पर्यावरण की पहली पाठशाला है। यहां पर लोग पौधों को बच्चों की तरह पालते है। इस राज्य ने देश को अनेक पर्यावरणविद् दिये है। हिमालय में तन और मन को ठीक करने की शक्ति है। हमें इन सब कामों के लिये बड़ा मन चाहिये; बड़ा समर्पण चाहिये।
परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि शिक्षा में पर्यावरण बहुत जरूरी है। पहले भी हमारी चर्चा माननीय निशंक के साथ हुई थी कि विद्यार्थियों को अब ’’ग्रेस माक्र्स के स्थान पर ग्रीन माक्र्स’’ दिये जाये। अब तो यह बहुत ही जरूरी हो गया है कि ’’पहाड़ के लोग वापस पहाड़ पर’’ क्योकि पहाड़ियों का दर्द भी पहाड़ जैसा; पहाड़ के लोगों का दर्द भी पहाड़ जैसा है और उसका समाधान भी एक ही है ’पलायन नहीं बल्कि घर वापसी’। कोरोना ने तो यह करके भी दिखा दिया कि चलो अपने गांवों और घरों की ओर, और उस पर प्रधानमंत्री मोदी ने आत्मनिर्भर भारत की मोहर भी लगा दी। गांव बदलेगा तो देश बदलेगा।
स्वामी चिदानंद ने कहा कि उत्तराखंड में तो ’पलायन निवारण की भी संजीवनी बूटी है ’पर्यटन’ वह भी ’ग्रीन पर्यटन-ग्रीन तीर्थाटन’। जड़ी-बूटियों से समृद्ध है अपना प्रदेश, अतः जो लोग वापस आये है उन्हें जैविक खेती, पहाड़ी संस्कृति, पहाड़ी मंडवा, रागी जैसे उत्पादों से युक्त पदार्थो का निर्माण, पहाड़ी दालें और अन्य पहाड़ी उत्पादों को बढ़ावा देना होगा, यहां का बुरांश, यहां का शर्बत, फल, फूल विश्व तक अपनी पहुंच बना सकते हैं। इस हेतु सरकार के साथ अन्य संस्थाओेेें का सहयोग भी बहुत जरूरी है तभी हम जो लोग कोरोना संकट के समय में अपने भाई-बहिन घर वापस आये हैं उनको मदद कर सकते हैं और भविष्य में होने वाले पलायन को भी रोक सकते हैं।
स्वामी चिदानंद ने कहा कि अब लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार देने की जरूरत है ताकि वे अपने परिवार वालों के साथ यही रहकर अपनी आजीविका चला सकें। उन्होनें कहा कि प्लास्टिक जैसे उत्पादों का उपयोग न करें, खुद भी स्वस्थ रहें और पहाड़ को भी स्वस्थ रखें। हमारे राज्य के पास हिमालय रूपी अपार आॅक्सीजन का भण्डार है तथा स्वच्छ जल और शान्ति का स्रोत माँ गंगा है अतः यहां पर पूरे विश्व से पर्यटक मानसिक शान्ति के साथ आक्सीजन लेने हेतु आयेंगे, हमने इन्हें ही सम्भाल कर रखा तो बहुत है। ग्रीन संदेश ही इस राज्य का संदेश हो। हमें ग्रीन कल्चर का निर्माण करना होगा, हमारे हर कार्य की शुरूआत से हरित शुरूआत हो। स्वामी चिदानंद ने कहा कि हमारे हर स्तर के पाठ्यक्रम में ग्रीन कल्चर-ग्रीन शिक्षा का समावेश करना होगा।

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